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राजस्थान के मंदिर

7 मंदिर

यह सूची अभी पूर्ण नहीं है — शोध पूरा होते ही इस राज्य के और महान मंदिर यहाँ जुड़ते जाएँगे।

राजस्थान वह भूमि है जहाँ राजाओं ने अपने आराध्य के सेवक बनकर राज किया। मेवाड़ में यह मर्यादा स्पष्ट है: उदयपुर से लगभग 22 किलोमीटर उत्तर कैलाशपुरी में शिव एकलिंगजी के रूप में राज्य करते हैं — काले संगमरमर की चतुर्मुख प्रतिमा, एक सौ आठ देवालयों वाले प्राचीर-घिरे परिसर के मध्य। एकलिंग माहात्म्य की परंपरा मंदिर की स्थापना आठवीं शताब्दी के बप्पा रावल से जोड़ती है, वर्तमान मूर्ति राणा रायमल के पंद्रहवीं शताब्दी के पुनर्निर्माण की है, और आज तक मेवाड़ के महाराणा राज्य को एकलिंगजी के दीवान होकर ही सँभालते आए हैं; महाशिवरात्रि यहाँ रात भर चलती उपासना का पर्व है। जयपुर ने यही नाता कृष्ण से बाँधा। गोविंद देव जी — वृंदावन का वह विग्रह, जिसे परंपरा श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ की रचना मानती है और जिसे रूप गोस्वामी ने वृंदावन में प्रकट किया — औरंगज़ेब के काल में ब्रज से सुरक्षित निकाला गया, और सवाई जयसिंह द्वितीय ने उन्हें अपने नये नगर के सच्चे अधिपति के रूप में सिटी पैलेस परिसर में विराजमान किया; तभी से राजघराना उनकी सेवा करता आया है, दिन में सात झाँकियों में पट खुलते हैं, और जन्माष्टमी पर आँगन भक्तों से उमड़ पड़ते हैं।

जयपुर से उत्तर, सीकर ज़िले की शेखावाटी में खाटू श्याम जी विराजते हैं — महाभारत के बर्बरीक, घटोत्कच के पुत्र, जिन्होंने कुरुक्षेत्र से पूर्व श्रीकृष्ण को अपना शीश अर्पित किया और वरदान पाया कि कलियुग में वे कृष्ण के ही नाम 'श्याम' से पूजित होंगे। भक्त उन्हें 'हारे का सहारा' कहते हैं, और फाल्गुन शुक्ल एकादशी के आसपास लगने वाले लक्खी मेले में रींगस से खाटू का मार्ग निशान उठाए नंगे पाँव पदयात्रियों से भर जाता है। मरुभूमि के भीतर, बीकानेर के दक्षिण देशनोक में करणी माता का धाम है — चारण कुल की वे तपस्विनी, जो देवी का अवतार मानी जाती हैं और बीकानेर राजघराने की रक्षिका कुलदेवी हैं; उनके मंदिर का संगमरमरी मुखभाग और चाँदी के द्वार महाराजा गंगा सिंह की भेंट हैं, और गर्भगृह में काबा — परंपरा के अनुसार उनकी शरण में पुनर्जन्म पाए उनके ही भक्त — सम्मानित परिजनों की भाँति विचरते हैं। यात्रा का द्वार जयपुर है, जहाँ राज्य का प्रमुख हवाई अड्डा और बड़ा रेल जंक्शन दोनों हैं: खाटू वहाँ से लगभग 80 किलोमीटर है और रींगस जंक्शन उसका रेलहेड, बीकानेर लगभग 330 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम, और उदयपुर लगभग 400 किलोमीटर दक्षिण — परिक्रमा के दो सुदूर छोर।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

MereMandir पर राजस्थान के कितने प्रमुख मंदिर सूचीबद्ध हैं?+

चार — शेखावाटी में सीकर ज़िले के खाटू श्याम जी, बीकानेर के पास देशनोक की करणी माता, उदयपुर के उत्तर कैलाशपुरी के एकलिंगजी, और जयपुर के सिटी पैलेस परिसर के गोविंद देव जी। ये मिलकर MereMandir की तीन परंपराओं को समेटते हैं — कृष्ण के दो धाम (खाटू के श्याम, जो कृष्ण के ही नाम से पूजित हैं, और गोविंद देव, जिन्हें जयपुर का राजघराना अपना सच्चा अधिपति मानकर सेवा करता है), मेवाड़ के राजदेवता का शिव महादेव धाम, और बीकानेर राजघराने की रक्षिका कुलदेवी का देवी धाम।

खाटू श्याम जी कौन हैं, और वे 'हारे का सहारा' क्यों कहलाते हैं?+

वे महाभारत के बर्बरीक हैं — घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र — जिनसे कुरुक्षेत्र के महायुद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने उनका शीश दान में माँगा। उस अद्वितीय महादान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में बर्बरीक उन्हीं के नाम 'श्याम' से पूजित होंगे। शीश रूप में विराजे बाबा श्याम को भक्त 'हारे का सहारा' कहते हैं: खाटू की आस्था है कि जो सब ओर से हारकर उनके दरबार आता है, उसे बाबा आश्रय देकर ही लौटाते हैं। इसी विश्वास की घोषणा हैं वे निशान — केसरिया ध्वज — जिन्हें पदयात्री रींगस से खाटू तक पैदल लेकर आते हैं।

क्या राजस्थान के मंदिरों के दर्शन एक ही यात्रा में हो सकते हैं?+

ये सहज ही जयपुर से तीन दिशाओं में बँटते हैं — जयपुर ही द्वार है, जहाँ राज्य का प्रमुख हवाई अड्डा और बड़ा रेल जंक्शन दोनों हैं। गोविंद देव जी नगर में ही हैं और खाटू लगभग 80 किलोमीटर — रींगस जंक्शन उसका रेलहेड, मंदिर से 17 किलोमीटर — इसलिए ये दोनों एक साथ सहज हैं। करणी माता के लिए लगभग 330 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम बीकानेर की ओर जाना होता है — देशनोक बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दक्षिण है और बीकानेर रेल-लाइन पर उसका अपना छोटा स्टेशन है — और एकलिंगजी सुदूर दक्षिण में उदयपुर से 22 किलोमीटर, जहाँ तक उदयपुर की उड़ानें और रेल दोनों पहुँचाती हैं। दो-तीन सहज यात्राओं में समूचा राज्य हो जाता है।

राजस्थान के मंदिर दर्शन का सर्वोत्तम समय क्या है?+

अक्टूबर से मार्च, जब मरुभूमि का मौसम सुहावना रहता है। खाटू का लक्खी मेला फाल्गुन शुक्ल एकादशी के आसपास (फरवरी-मार्च) भरता है — वर्ष का सबसे बड़ा समागम, जब रींगस-खाटू मार्ग निशान-पदयात्रियों से भर जाता है; करणी माता के दो मेले चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में लगते हैं; गोविंद देव जी की जन्माष्टमी जयपुर का महोत्सव है और एकलिंगजी की महाशिवरात्रि मेवाड़ का। ग्रीष्म में मरुस्थल तपता है, तब प्रातःकालीन दर्शन ही उत्तम रहता है।