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ब्रज यात्रा

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ब्रज — श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की भूमि — पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना के तट पर फैला वह छोटा-सा क्षेत्र है जहाँ हर गाँव किसी न किसी लीला की स्मृति सँजोए हुए है। यह मार्ग तीन नगरों के पाँच दर्शनों से ब्रज के हृदय की परिक्रमा कराता है। आरम्भ मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से होता है — वही कारागार, जहाँ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि में देवकी-वसुदेव के यहाँ भगवान ने अवतार लिया। वहाँ से पुरानी नगरी की गलियों से होते हुए श्री द्वारकाधीश मंदिर पहुँचते हैं, जिसकी स्थापना सन् 1814 में हुई और जहाँ वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग की सेवा-क्रम परम्परा से ठाकुरजी की सेवा होती है। द्वारकाधीश से कुछ ही पग दूर विश्राम घाट है — मथुरा का प्रधान घाट, जहाँ मान्यता है कि कंस-वध के पश्चात् भगवान ने विश्राम किया था, और जहाँ से नगर की घाट-परिक्रमा आरम्भ होकर वहीं पूर्ण होती है। संध्या को विश्राम घाट अवश्य लौटें: प्रायः सात बजे यमुना आरती होती है, पान के पत्तों पर दीप जल-धारा में प्रवाहित किए जाते हैं और सारा तट दीपों, शंख और घंटों से गूँज उठता है। मथुरा को आधा दिन अवश्य दें — पच्चीस घाट, पुराने बाज़ार और पेड़े की दुकानें, और आरती के समय यमुना में नौका-विहार।

मथुरा से लगभग ग्यारह-पंद्रह किलोमीटर आगे यमुना के तट पर वृंदावन है, जहाँ इस मार्ग के अगले दो दर्शन हैं। श्री बांके बिहारी मंदिर में वही विग्रह विराजमान हैं, जिन्हें सोलहवीं शताब्दी के संगीत-मूर्धन्य संत स्वामी हरिदास ने निधिवन के कुंज में प्रकट किया था; निधिवन में प्रवेश करते ही सबसे पहले उन्हीं की समाधि के दर्शन होते हैं, और संध्या-आरती के पश्चात् वह वन प्रतिदिन बंद कर दिया जाता है — पुजारी रंग महल में श्रीराधा की शय्या सजाकर लौट आते हैं, और उस रात्रि-लीला का साक्षी कोई नहीं होता। सन् 1851 में प्रतिष्ठित श्री रंगजी मंदिर श्रीरंगम के रंगनाथस्वामी की श्रीवैष्णव परम्परा को ब्रज में ले आया — यमुना के मैदान में खड़ा दक्षिण-शैली का विशाल गोपुरम और स्वर्ण-मंडित ध्वज-स्तम्भ। और सन् 2012 में जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा निर्मित प्रेम मंदिर श्वेत संगमरमर तथा संध्या की रंग-बिरंगी आभा के साथ वृंदावन के इस चरण को पूर्ण करता है। मंदिरों के बीच यमुना-तट पर भी उतरें — केसी घाट, जहाँ केशी नामक अश्व-दैत्य के वध के पश्चात् भगवान ने स्नान किया, और कालिया घाट, जहाँ आज भी वह खोखला कदम्ब खड़ा है जिससे कूदकर उन्होंने कालिय नाग के फणों पर नृत्य किया था। इसके पश्चात् यमुना पार गोकुल — मथुरा से लगभग दस-पंद्रह किलोमीटर — जहाँ बाल-लीलाओं का वास है: नंद बाबा का भवन, ब्रह्मांड घाट, और रमण रेती की कोमल बालू, जिसमें आज भी भक्त लोटते हैं।

तीन नगर और पाँच मंदिर — दो दिन में यह यात्रा सहज हो जाती है, और शांतिपूर्वक करें तो तीन दिन में। किंतु ब्रज इससे कहीं अधिक विस्तृत है। मथुरा से लगभग इक्कीस किलोमीटर पश्चिम गोवर्धन है, और उसकी परिक्रमा इस भूमि की सबसे बड़ी पदयात्रा — इक्कीस किलोमीटर (सात कोस) का वह मार्ग, जो दानघाटी अथवा मानसी गंगा से आरम्भ होकर राधाकुंड-श्यामकुंड, कुसुम सरोवर और गोविंद कुंड होते हुए वहीं लौटता है। श्रद्धालु नंगे पाँव, प्रदक्षिणा-क्रम से चलते हैं, गिरिराज को सदा दाहिनी ओर रखते हैं और पर्वत पर चढ़ते नहीं — क्योंकि गिरिराज जी स्वयं श्रीकृष्ण का स्वरूप माने जाते हैं; पैदल प्रायः पाँच से छह घंटे लगते हैं। बरसाना, मथुरा से लगभग पैंतालीस किलोमीटर दूर, श्रीराधारानी की नगरी है — भानुगढ़ की पहाड़ी पर विराजमान श्रीजी (लाड़ली जी) का मंदिर — और होली से लगभग एक सप्ताह पूर्व वहीं लठमार होली का अद्भुत उत्सव होता है, जब बरसाना की गोपियाँ नंदगाँव के हुरियारों को लाठियों से खदेड़ती हैं, और अगले दिन वही लीला नंदगाँव में दोहराई जाती है। इन सबका पूर्ण रूप है ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा — लगभग 252 किलोमीटर का वह महापथ, जो बारह वन, चौबीस उपवन और बीस कुंडों को अपने में समेटता है; वाहन से सात दिन में, और पुरातन परम्परा में पैदल कई सप्ताहों में, विशेषकर कार्तिक मास में। यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च सर्वोत्तम है; मई-जून की तपती लू से बचें, जब पारा 40 डिग्री पार कर 45 डिग्री तक पहुँच जाता है। जन्माष्टमी और होली के सप्ताह में ब्रज अपनी पूर्ण शोभा में होता है, पर तब अपार भीड़ उमड़ती है — ठहरने की व्यवस्था महीनों पहले करें, और निकलने से पूर्व हर मंदिर के दर्शन-समय की पुष्टि कर लें, क्योंकि वे ऋतु के अनुसार बदलते रहते हैं।

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दर्शन-क्रम में यात्रा मार्ग

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    Shri Krishna Janmabhoomi temple complex, Mathura

    श्री कृष्ण जन्मभूमि

    मथुरा, उत्तर प्रदेश

    मथुरा के उस कारागार-कक्ष पर निर्मित मंदिर परिसर जहाँ अर्धरात्रि में कृष्ण का जन्म हुआ — ब्रज का हृदय और वैष्णव जगत की पवित्रतम भूमियों में से एक।

  2. 2~1 किमी हवाई दूरी
    The painted Rajasthani courtyard of the Dwarkadhish haveli, Mathura, arcaded on two storeys beneath its galleries of Krishna's life

    श्री द्वारकाधीश, मथुरा

    मथुरा, उत्तर प्रदेश

    एक सेठ की हवेली में राजा के रूप में विराजे श्रीकृष्ण — मथुरा के विश्राम घाट के पास वह पुष्टिमार्गीय धाम, जहाँ पट दिन में आठ बार खुलते हैं और उनके बीच एक बार भी नहीं।

  3. 3~8 किमी हवाई दूरी
    The carved sandstone front of Shri Banke Bihari Mandir rising in tiers of arcaded galleries above its Vrindavan lane, strung with flowers

    श्री बाँके बिहारी मंदिर, वृंदावन

    वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश

    बाँके बिहारी के रूप में श्रीकृष्ण, जो निधिवन के कुंज में स्वामी हरिदास के समक्ष प्रकट हुए — जहाँ हर कुछ ही क्षणों में पट गिर जाता है, कोई घंटा नहीं बजता, और मंगला आरती वर्ष में केवल एक बार होती है।

  4. 4~1 किमी हवाई दूरी
    The Dravidian rajagopuram of Shri Rangji (Ranganatha) Mandir rising over Vrindavan

    श्री रंगजी (रंगनाथ), वृंदावन

    वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश

    ब्रज के मध्य में एक सप्तखंडी द्रविड़ गोपुरम और पचास फुट ऊँचा स्वर्णमंडित ध्वजस्तंभ — दक्षिण के रंगनाथ, जिन्हें 1851 में उत्तर लाया गया, ताकि आंडाल की वह अभिलाषा पूर्ण हो कि वे वृंदावन में कृष्ण के चरणों में निवास करें।

  5. 5~16 किमी हवाई दूरी
    Brahmand Ghat at Gokul, its red sandstone chhatris standing over the Yamuna

    श्री गोकुलनाथ जी, गोकुल

    गोकुल, मथुरा, उत्तर प्रदेश

    गोकुल की गलियों में श्री गोकुलनाथ जी की हवेली — उस नगर का प्रमुख धाम जहाँ जन्म की उसी रात कृष्ण को लाया गया था; वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग की चतुर्थ पीठ का आसन, और बाल-लीलाओं का घर।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रज यात्रा में कितने दिन लगते हैं?

दो दिनों में मुख्य परिक्रमा सहजता से पूर्ण हो जाती है, और तीन दिनों में पूरी शांति से। पाँचों मंदिर एक ही छोटे क्षेत्र में हैं — वृंदावन मथुरा से मात्र ग्यारह-पंद्रह किलोमीटर, और गोकुल यमुना पार लगभग दस-पंद्रह किलोमीटर। अतः पहले दिन मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, द्वारकाधीश, विश्राम घाट और संध्या की यमुना आरती, तथा दोपहर में गोकुल; दूसरा दिन पूर्णतः वृंदावन का — बांके बिहारी, निधिवन, रंगजी, प्रेम मंदिर और यमुना के घाट। गोवर्धन परिक्रमा अथवा बरसाना-नंदगाँव भी करना हो, तो एक दिन और जोड़ लें।

ब्रज यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय कौन-सा है? जन्माष्टमी और होली पर जाना कैसा रहेगा?

अक्टूबर से मार्च का समय सर्वोत्तम है, और अक्टूबर-नवंबर सबसे सुखद — मौसम सुहावना और दर्शन की कतारें सह्य। मई-जून से बचें, जब यमुना का यह मैदान 40 डिग्री पार कर 45 डिग्री तक तप जाता है। जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, प्रायः अगस्त-सितंबर) पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि में अर्धरात्रि के अभिषेक हेतु वर्ष का सबसे बड़ा जनसमूह उमड़ता है, और होली के सप्ताह में — बरसाना तथा नंदगाँव की लठमार होली, फिर रंगभरी एकादशी को बांके बिहारी की फूलों वाली होली — समूचा ब्रज रंगों में डूब जाता है। दोनों अवसर अलौकिक हैं, और दोनों में अपार भीड़, वाहन-प्रतिबंध तथा महीनों पहले भरे हुए आवास मिलते हैं। या तो उत्सव के लिए जाएँ, या शांत दर्शन के लिए — दोनों एक साथ प्रायः संभव नहीं।

गोवर्धन परिक्रमा के विषय में क्या जानना आवश्यक है?

यह गिरिराज गोवर्धन की इक्कीस किलोमीटर (सात कोस) की प्रदक्षिणा है, जो प्रायः गोवर्धन नगर में दानघाटी अथवा मानसी गंगा से आरम्भ होकर वहीं पूर्ण होती है; मथुरा से गोवर्धन लगभग इक्कीस-बाईस किलोमीटर है। पैदल लगभग पाँच से छह घंटे लगते हैं; वृद्धजनों और परिवारों के लिए लगभग नौ किलोमीटर की छोटी परिक्रमा भी है, और ई-रिक्शा या कार से पूरा चक्र प्रायः दो-तीन घंटे में हो जाता है। परम्परा है कि नंगे पाँव चलें, गिरिराज को सदा दाहिनी ओर रखें और पर्वत पर कभी न चढ़ें — गिरिराज जी स्वयं श्रीकृष्ण का स्वरूप हैं, अतः उनकी शिलाओं पर पाँव भी नहीं रखा जाता। गर्मी में सूर्योदय से पूर्व चलें और जल साथ रखें। गोवर्धन पूजा-अन्नकूट (दीपावली के अगले दिन), पूर्णिमा-एकादशी, गुरु पूर्णिमा तथा पुरुषोत्तम अधिक मास में यहाँ सर्वाधिक भीड़ रहती है।

गोकुल, बरसाना और गोवर्धन को मथुरा-वृंदावन के साथ कैसे जोड़ें?

गोकुल सबसे सरल है — मथुरा से यमुना पार लगभग दस-पंद्रह किलोमीटर, अतः वह मथुरा वाले दिन में ही जुड़ जाता है; महावन, ब्रह्मांड घाट और रमण रेती वहीं हैं, और कुछ आगे बलदेव (दाऊजी) का मंदिर। गोवर्धन मथुरा से लगभग इक्कीस-बाईस और वृंदावन से लगभग पच्चीस किलोमीटर है — उसके लिए आधा दिन रखें, और परिक्रमा करनी हो तो पूरा दिन। बरसाना मथुरा से लगभग पैंतालीस किलोमीटर है और नंदगाँव उससे मात्र आठ-ग्यारह किलोमीटर, इसलिए श्रीराधा और श्रीकृष्ण की ये दोनों नगरियाँ सदा एक साथ, एक पश्चिमी चक्र में की जाती हैं — प्रायः मार्ग में गोवर्धन को भी जोड़ लिया जाता है। और जो यात्रा इन सबको एक ही अखंड सूत्र में पिरोती है, वह है चौरासी कोस की ब्रज परिक्रमा।