महाराष्ट्र के मंदिर
13 मंदिर
भारत की पावन भूमि में महाराष्ट्र का स्थान विशेष है — यहाँ गणपति, शिव और देवी तीनों परंपराएँ एक ही राज्य में फलती-फूलती हैं। पुणे के चारों ओर फैली अष्टविनायक यात्रा में आठ स्वयंभू गणेश मंदिर आते हैं — मोरगाव के मयूरेश्वर, सिद्धटेक के सिद्धिविनायक, पाली के बल्लाळेश्वर, महड के वरदविनायक, थेऊर के चिंतामणि, लेण्याद्री के गिरिजात्मज, ओझर के विघ्नहर और रांजणगाव के महागणपति। पेशवाओं के संरक्षण में पली यह परिक्रमा आज भी महाराष्ट्र की सबसे प्रिय तीर्थयात्राओं में गिनी जाती है।
शिव-भक्ति के लिए यहाँ बारह ज्योतिर्लिंगों में से तीन विराजमान हैं — सह्याद्रि के घने वनों में भीमाशंकर, गोदावरी के उद्गम पर नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर, और एलोरा की गुफाओं के निकट घृष्णेश्वर, जिन्हें परंपरा में बारहवाँ ज्योतिर्लिंग माना जाता है। दक्षिण में कोल्हापूर की महालक्ष्मी (अंबाबाई) शक्तिपीठ के रूप में पूजित हैं, जहाँ किरणोत्सव में सूर्य की किरणें सीधे देवी के चरणों तक पहुँचती हैं। यात्रा की दृष्टि से यह भूगोल बड़ा सुविधाजनक है — अष्टविनायक मंदिर और भीमाशंकर पुणे से, त्र्यंबकेश्वर नासिक से, घृष्णेश्वर औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) से और महालक्ष्मी कोल्हापूर से जुड़ते हैं। इस तरह दो-तीन यात्राओं में महाराष्ट्र के सभी बारह प्रमुख मंदिरों के दर्शन सहज हो जाते हैं।
ज्योतिर्लिंग
इस परंपरा के बारे में जानें →
भीमाशंकर
पुणे ज़िला, महाराष्ट्र
सह्याद्रि के वनों में बसा एक ज्योतिर्लिंग — भीमा नदी का उद्गम और दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी (शेकरू) का घर।
त्र्यंबकेश्वर
नासिक, महाराष्ट्र
नासिक के निकट ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में, गोदावरी के उद्गम पर विराजमान त्रिमुखी लिंग।
घृष्णेश्वर
एलोरा, औरंगाबाद, महाराष्ट्र
बारहवाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग, एलोरा की गुफाओं के निकट — अहिल्याबाई होल्कर द्वारा पुनर्जीवित एक लाल पत्थर का मंदिर।
शक्ति पीठ
इस परंपरा के बारे में जानें →अष्टविनायक
इस परंपरा के बारे में जानें →मयूरेश्वर, मोरगाव
मोरगाँव, पुणे, महाराष्ट्र
अष्टविनायक यात्रा का प्रथम और अंतिम नमन — जहाँ गणेश ने अपने मयूर पर सवार होकर कर्हा नदी के तट पर मोरगाँव में सिंधु राक्षस का वध किया।
सिद्धिविनायक, सिद्धटेक
सिद्धटेक, अहिल्यानगर, महाराष्ट्र
आठों में एकमात्र दक्षिण-सूँड़ वाले गणेश — भीमा नदी के ऊपर एक पहाड़ी पर विराजमान सिद्धिविनायक, सिद्धि अर्थात् उपलब्धि के दाता।
बल्लाळेश्वर, पाली
पाली, रायगढ़, महाराष्ट्र
एकमात्र अष्टविनायक जो किसी भक्त के नाम पर है — बालक बल्लाल के नाम पर — सरसगढ़ दुर्ग और अंबा नदी के बीच स्थित, जिसका प्रसाद बेसन का लड्डू है।

वरदविनायक, महड
महड, रायगढ़, महाराष्ट्र
आठों में वरदाता — महड ग्राम के वरदविनायक, जहाँ कहा जाता है कि 1892 से एक नंददीप दीपक जलता आ रहा है।
चिंतामणि, थेऊर
थेऊर, पुणे, महाराष्ट्र
वह गणेश जो अशांत मन को शांति देते हैं — पाँचवें अष्टविनायक, थेऊर की नदी-संगम पर विराजमान और पेशवाओं का अत्यंत प्रिय तीर्थ।

गिरिजात्मज, लेण्याद्री
लेण्याद्री, पुणे, महाराष्ट्र
आठों में एकमात्र पर्वत-एवं-गुफा वाले गणेश — गिरिजा के पुत्र, कुकड़ी नदी के ऊपर एक प्राचीन शैलोत्कीर्ण बौद्ध विहार में विराजमान।
विघ्नहर, ओझर
ओझर, पुणे, महाराष्ट्र
कुकड़ी के तट पर विघ्नों को हरने वाले — स्वर्ण-गुंबद वाला ओझर तीर्थ, जहाँ गणेश ने विघ्नासुर दैत्य का दमन किया।
महागणपति, रांजणगाव
रांजणगाँव, पुणे, महाराष्ट्र
आठों में सर्वाधिक बलशाली — रांजणगाँव तीर्थ, जहाँ स्वयं शिव ने त्रिपुरासुर दैत्य का सामना करने से पूर्व गणेश का आवाहन किया।
विष्णु धाम
इस परंपरा के बारे में जानें →यह सूची अभी पूर्ण नहीं है — शोध पूरा होते ही इस राज्य के और महान मंदिर यहाँ जुड़ते जाएँगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
MereMandir पर महाराष्ट्र के कितने प्रमुख मंदिर सूचीबद्ध हैं?+
बारह — पुणे के आसपास के आठ अष्टविनायक गणेश मंदिर (मोरगाव, सिद्धटेक, पाली, महड, थेऊर, लेण्याद्री, ओझर, रांजणगाव), तीन ज्योतिर्लिंग (भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर, घृष्णेश्वर) और शक्तिपीठ के रूप में पूजित कोल्हापूर का महालक्ष्मी मंदिर। इस प्रकार गणपति, शिव और देवी — तीनों परंपराएँ एक ही राज्य की सूची में समाहित हैं।
महाराष्ट्र में कौन-कौन से ज्योतिर्लिंग हैं?+
MereMandir की सूची में महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंग हैं — पुणे के उत्तर-पश्चिम में सह्याद्रि की पहाड़ियों में भीमाशंकर, नासिक के पास गोदावरी के उद्गम स्थल पर त्र्यंबकेश्वर, और एलोरा की गुफाओं के निकट घृष्णेश्वर, जिन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में बारहवाँ और अंतिम ज्योतिर्लिंग कहा गया है।
क्या अष्टविनायक यात्रा को ज्योतिर्लिंग दर्शन के साथ जोड़ा जा सकता है?+
हाँ, बहुत सहजता से। आठ अष्टविनायक मंदिर पुणे से दो-तीन दिन की परिक्रमा में हो जाते हैं और भीमाशंकर वहीं से एक दिन की यात्रा है। त्र्यंबकेश्वर नासिक की ओर पड़ता है, घृष्णेश्वर औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) से एलोरा के साथ जुड़ता है, और कोल्हापूर की महालक्ष्मी के लिए दक्षिण की अलग यात्रा उपयुक्त रहती है।
महाराष्ट्र के मंदिरों के दर्शन का सर्वोत्तम समय क्या है?+
अक्टूबर से फरवरी का मौसम ठंडा और शुष्क रहता है — अष्टविनायक परिक्रमा और भीमाशंकर जैसे पहाड़ी मंदिरों के लिए आदर्श। श्रावण और गणेश चतुर्थी (अगस्त-सितंबर) में भक्ति का उत्सव चरम पर होता है पर भीड़ बहुत रहती है; वर्षा में सह्याद्रि हरा-भरा रहता है पर मार्ग धीमे हो जाते हैं। कोल्हापूर का किरणोत्सव भी एक विशेष अवसर है।
