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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026

पर्व तिथियाँ:शुक्रवार 4 सितम्बर 2026 (दही हांडी: शनिवार 5 सितम्बर)

लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व मथुरा पर अत्याचारी कंस का शासन था। आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान ही उसका वध करेगी, तो कंस ने अपनी बहन देवकी और वसुदेव जी को कारागार में डाल दिया और उनकी छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला। फिर भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की उस घनघोर वर्षा-भरी मध्यरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र में, स्वयं भगवान ने देवकी की आठवीं संतान के रूप में अवतार लिया। जन्म होते ही कारागार के ताले अपने आप खुल गए, बेड़ियाँ टूट गईं और पहरेदार गहरी नींद में डूब गए। वसुदेव जी नन्हे कान्हा को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल ले गए — शेषनाग ने अपने फनों से वर्षा से रक्षा की — और बालक को नंद बाबा और यशोदा मैया की गोद में सौंप आए। यही मध्यरात्रि का दिव्य क्षण जन्माष्टमी का प्राण है।

इस दिन भक्त दिन भर व्रत रखते हैं। मंदिर फूलों और झाँकियों से सजते हैं और रात भर जागरण चलता है — भजन-कीर्तन की धारा ठीक बारह बजे तक बढ़ती जाती है। मध्यरात्रि में शंख और घंटों के नाद के बीच कान्हा का जन्म होता है; लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक होता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और सजे हुए पालने में झुलाते हुए भक्त गाते हैं — “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!” झूलन के दिनों में ठाकुर जी फूलों से सजे झूलों में विराजते हैं। महाराष्ट्र में अगले दिन दही हांडी की धूम रहती है — गोविंदाओं की टोलियाँ मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर टँगी दही की मटकी फोड़ती हैं, जैसे नन्हे कान्हा गोकुल में माखन चुराते थे।

इस पर्व के हृदय हैं दो धाम। मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर उसी कारागार-स्थल पर खड़ा है जहाँ कान्हा ने जन्म लिया — जन्माष्टमी की रात लाखों श्रद्धालु मध्यरात्रि के महाभिषेक के साक्षी बनते हैं, और पास ही वृंदावन बांके बिहारी के उत्सव से जगमगाता है। पश्चिम में द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर उन कृष्ण का जन्मोत्सव मनाता है जो मथुरा छोड़कर द्वारका के राजा बने। जन्मभूमि मथुरा से कर्मभूमि द्वारका तक — यही दोनों धाम भगवान की सम्पूर्ण लीला-यात्रा के साक्षी हैं, इसीलिए ये इस महापर्व के केंद्र हैं।

दर्शन कहाँ करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

2026 में जन्माष्टमी कब है?+

वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को है। निशिता (मध्यरात्रि) पूजा का मुहूर्त 4–5 सितंबर की रात लगभग 11:57 बजे से 12:43 बजे तक है (द्रिक पंचांग, नई दिल्ली)। इस वर्ष स्मार्त और इस्कॉन/वैष्णव — दोनों परंपराएँ 4 सितंबर को ही पर्व मनाएँगी, और दही हांडी शनिवार, 5 सितंबर 2026 को होगी।

जन्माष्टमी मध्यरात्रि में क्यों मनाई जाती है?+

शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि — निशिता काल — में रोहिणी नक्षत्र के दौरान मथुरा के कंस के कारागार में हुआ था। इसीलिए भक्त दिन भर व्रत रखते हैं, रात भर भजन-कीर्तन से जागरण करते हैं और ठीक बारह बजे अभिषेक, आरती और शंखनाद के साथ भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं।

जन्माष्टमी सबसे भव्य रूप से कहाँ मनाई जाती है?+

भगवान की जन्मभूमि और बाल-लीला की भूमि मथुरा-वृंदावन में सबसे भव्य उत्सव होता है — विशेषकर श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में। गुजरात के द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर अपने राजा का जन्मोत्सव पूरे वैभव से मनाता है। मुंबई और महाराष्ट्र दही हांडी के लिए प्रसिद्ध हैं, और देश-विदेश के इस्कॉन मंदिरों में विशाल अभिषेक व कीर्तन होते हैं।

दही हांडी क्या है?+

दही हांडी मुख्यतः महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के अगले दिन (2026 में शनिवार, 5 सितंबर को) मनाई जाती है और बाल कृष्ण की माखन-चोरी की लीलाओं का स्मरण कराती है। दही-माखन और पुरस्कार से भरी मटकी ऊँचाई पर टाँगी जाती है, और गोविंदा टोलियाँ कई मंज़िलों का मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती हैं, जबकि भीड़ जयकारों के साथ उन पर पानी उड़ेलती है।

जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि में क्या होता है?+

मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर उसी कारागार-कोठरी पर बना है जहाँ भगवान का जन्म माना जाता है। जन्माष्टमी पर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं; दिन भर कीर्तन और झाँकियाँ चलती हैं, और मध्यरात्रि में शंख-घंटों के बीच ठाकुर जी का पंचामृत से महाभिषेक होता है, फिर नई पोशाक में शृंगार, पालना-झुलाई और भागवत भवन में आरती होती है।