कार्तिकेय सुब्रह्मण्य के रूप में — नागों के स्वामी; कुमारधारा के तट पर कर्नाटक का वह महान क्षेत्र, जहाँ वासुकि ने स्वामी की शरण पाई और जहाँ सर्पदोष के संस्कार आज भी अविच्छिन्न रूप से चलते हैं।
- देवता
- सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय), वासुकि सहित
- स्थान
- सुब्रह्मण्य, दक्षिण कन्नड़ ज़िला, कर्नाटक
- श्रेणी
- मुरुगन
- स्थापना
- अति प्राचीन — किसी निश्चित शताब्दी का प्रमाण उपलब्ध नहीं; 'शंकर विजयम्' में 'कुक्केलिंग' के रूप में स्तुत और नवीं शताब्दी के शिलालेख में उल्लिखित; गर्भगृह का जीर्णोद्धार 2005
- स्थल
- पश्चिमी घाट में कुमार पर्वत की तलहटी में, कुमारधारा नदी के तट पर
- घूमने का सर्वोत्तम समय
- अक्टूबर से मार्च; चंपा षष्ठी (नवंबर–दिसंबर) यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है
- कर्नाटक का महान कार्तिकेय-क्षेत्र — तमिल दक्षिण के छह अरुपडै वीडु में से नहीं
- गरुड़ से बचने के लिए वासुकि ने यहीं स्वामी की शरण ली; स्वामी एक अंश से उनमें सन्निहित हैं
- परशुराम की सृष्टि के सप्त क्षेत्रों में गिना जाता है; गुप्त क्षेत्र भी कहलाता है
- यहाँ का मूल प्रसाद मृत्तिका है — बाँबी (वल्मीक) की मिट्टी
- सर्प संस्कार दो दिन का संस्कार है, जिसका आरंभ कुमारधारा-स्नान और दर्शन से होता है
- आश्लेष बलि और नागप्रतिष्ठा एक दिन की सेवाएँ — एकादशी और उपवास के दिनों को छोड़कर प्रतिदिन
- चंपा षष्ठी — मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी — यहाँ का महापर्व, जिस दिन ब्रह्मरथ खींचा जाता है
- पाव किलोमीटर दूर आदि सुब्रह्मण्य को मंदिर स्वामी का मूल स्थान बताता है
- मंदिर के नियमानुसार दर्शन से पूर्व शर्ट और बनियान उतारे जाते हैं
महत्व
यहाँ स्वामी की उपासना नाग रूप में होती है। पुराण कहते हैं कि गरुड़ से बचने के लिए वासुकि और अन्य नाग इसी स्थान की गुफाओं में स्वामी की शरण में आए थे; मंदिर से नदी की ओर उतरते मार्ग पर स्थित बिलद्वार नामक गुफा वही स्थान बताई जाती है जहाँ नागराज छिपे रहे। मुख्य द्वार से लगभग पाव किलोमीटर आगे आदि सुब्रह्मण्य है, जिसे मंदिर स्वयं स्वामी का मूल स्थान कहता है। यहाँ का मूल प्रसाद मृत्तिका है — वल्मीक अर्थात् बाँबी की मिट्टी — और भक्त संतान, विवाह, चिरकालीन चर्मरोगों से मुक्ति तथा नागदोष के निवारण के लिए आते हैं।
सर्पदोष से संबंधित संस्कार यहाँ की स्थिर, व्यवस्थित उपासना-परंपरा हैं, जिनका क्रम मंदिर स्वयं प्रकाशित करता है। सर्प संस्कार दो दिन चलता है: भक्त पवित्र कुमारधारा में स्नान कर, स्वामी का दर्शन कर, निर्धारित दिन प्रातः साढ़े आठ बजे आदि सुब्रह्मण्य में उपस्थित होता है, पुरोहित के निर्देशों का पालन करता है, और दूसरे दिन प्रातः प्रदक्षिणा के पश्चात् मध्याह्न महापूजा के उपरांत बाह्य प्रांगण के नागप्रतिष्ठा मंटप में सम्मिलित होता है। जिसका उपनयन हो चुका हो और जिसने पितृकर्म किया हो, वह स्वयं यह सेवा कर सकता है; शेष के लिए मंदिर क्रियाकर्ता नियुक्त करता है। यह सेवा दशमी, एकादशी, गोकुलाष्टमी, शिवरात्रि, ग्रहण तथा वार्षिक उत्सव के पंद्रह दिनों को छोड़कर सभी दिन होती है। आश्लेष बलि और नागप्रतिष्ठा एक ही दिन की सेवाएँ हैं, जो एकादशी और उपवास के दिनों को छोड़कर प्रतिदिन होती हैं — आश्लेष बलि तीन बार, प्रातः साढ़े छह और साढ़े आठ बजे तथा सायं पाँच बजे; और प्रार्थना सेवा प्रत्येक महापूजा के पश्चात् स्वामी के सन्निधि में होती है।
चंपा षष्ठी यहाँ का महापर्व है — मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी, वही तिथि जिस पर इस तट पर हुए विवाह का स्मरण होता है — और यही वार्षिक उत्सव का शिखर है, जिसमें ब्रह्मरथ खींचा जाता है। कोप्परिगे चढ़ाए जाने से पूर्व की एकादशी को प्रधान अर्चक प्रातः शुभ मुहूर्त में गर्भगृह से आकर भक्तों को मूल मृत्तिका प्रसाद वितरित करते हैं। नाग को चंदन और विशेष रूप से हल्दी अर्पित करना, अरलु (लावा), गुड़ और केले का समर्पण, एलनीर तथा क्षीर का अभिषेक, कलश स्नान — ये प्राचीन विधियाँ आज भी चलती हैं। दर्शन से पूर्व कुमारधारा में स्नान यहाँ की परंपरा है, और इस जल के विषय में मान्यता है कि यह चर्मरोगों का शमन करता है।
इतिहास
कुक्के सुब्रह्मण्य कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ ज़िले में, कडब तालुक के सुब्रह्मण्य ग्राम में, पश्चिमी घाट के भीतर कुमारधारा नदी के तट पर विराजमान है; मंदिर के पीछे कुमार पर्वत उठता है और निकट ही दर्पण तीर्थ बहती है। मंदिर का अपना विवरण कहता है कि असुरों के दमन के लिए जन्म लेने वाले कुमारस्वामी ने तारक आदि असुरों पर विजय पाई और अपने भ्राता गणपति के साथ कुमार पर्वत पर आए; वहीं देवेंद्र ने मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी के दिन कुमारधारा तीर्थ के तट पर अपनी पुत्री देवसेना का पाणिग्रहण उनके साथ कराया। उसी समय वहाँ तपस्यारत नागराज वासुकि की प्रार्थना स्वीकार कर स्वामी ने उन्हें यह वर दिया कि वे देवसेना सहित एक अंश से सदा उनमें सन्निहित रहकर इसी क्षेत्र में निवास करेंगे।
इस मंदिर की कोई निश्चित शताब्दी नहीं ठहराई जा सकती। इसका अपना अभिलेख स्कंदपुराण की ओर संकेत करता है, 'शंकर विजयम्' की उस पंक्ति 'भजे कुक्केलिंगम्' की ओर जिसमें कुक्के के स्वामी का गुणगान है, और नवीं शताब्दी के उस शिलालेख की ओर जिसमें कुक्के का स्थलनाम पहले से अंकित मिलता है। यह क्षेत्र परशुराम की सृष्टि के सप्त क्षेत्रों में गिना जाता है और गुप्त क्षेत्र भी कहलाता है; यहाँ की मूर्तियाँ उद्भव — स्वयंभू — अथवा ऋषियों द्वारा प्रतिष्ठित मानी जाती हैं। मंदिर का प्रबंध कर्नाटक का धार्मिक एवं धर्मादाय (मुज़राई) विभाग करता है, गर्भगृह का जीर्णोद्धार 2005 में हुआ, और यहाँ के अर्चक इसी तट की शिवल्ली माध्व परंपरा के हैं।
स्थापत्य
मंदिर पूर्वाभिमुख है और इसमें प्रवेश गर्भगृह के पीछे की ओर से होता है; दो मंडप हैं, जिनमें भीतरी मंडप गर्भगृह तक ले जाता है। पीठ पर वासुकि सहित सुब्रह्मण्य की प्रतिमा है और उससे कुछ नीचे शेष की। उनके समक्ष रजत-मंडित गरुड़ कंब खड़ा है, जिसके विषय में माना जाता है कि वह भीतर विराजमान वासुकि के नि:श्वास से दर्शनार्थियों की रक्षा करता है। भीतरी प्रांगण में कुक्केलिंग, उमामहेश्वर और कालभैरव के सन्निधान हैं, और निकट ही क्षेत्र की रक्षक होसलिगम्मा; बाह्य प्रांगण में नागप्रतिष्ठा मंटप है, और राजांगण से शेष वाहन सहित बंडी उत्सव निकलता है। ऊपर, पुष्पगिरि अभयारण्य के भीतर, कुमार पर्वत लगभग सत्रह सौ मीटर तक उठता है।
त्योहार
समय
प्रतिदिन लगभग प्रातः 6:30 से दोपहर 1:30 तक और अपराह्न 3:30 से रात्रि 9:00 बजे तक; नड़ई 9:00 से 9:30 के बीच बंद होती है। मंदिर के नियमानुसार दर्शन से पूर्व शर्ट और बनियान उतारना आवश्यक है। सर्प संस्कार के भक्त प्रातः 8:30 बजे आदि सुब्रह्मण्य में उपस्थित होते हैं; आश्लेष बलि तीन बार — प्रातः 6:30, 8:30 और सायं 5:00 बजे। उत्सवों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर कार्यालय से पुष्टि कर लें।
सुब्रह्मण्य दक्षिण कन्नड़ के कडब तालुक में है — मंगलूरु से लगभग एक सौ चार किलोमीटर और बेंगलूरु से लगभग दो सौ अस्सी किलोमीटर दूर। निकटतम हवाई अड्डा मंगलूरु है, जो लगभग एक सौ पाँच किलोमीटर दूर है; निकटतम रेलवे स्टेशन सुब्रह्मण्य रोड है, लगभग बारह किलोमीटर, और मंगलूरु तथा बेंगलूरु से बसें चलती हैं। धर्मस्थल यहाँ से पचपन किलोमीटर और मडिकेरी पचहत्तर किलोमीटर दूर है।
समय सांकेतिक हैं — यात्रा से पहले कृपया मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि कर लें।
आसपास के मंदिर
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर कहाँ स्थित है?+
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर सुब्रह्मण्य, दक्षिण कन्नड़ ज़िला, कर्नाटक, भारत में स्थित है।
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर में किस देवता की पूजा होती है?+
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय), वासुकि सहित को समर्पित है।
कुक्के सुब्रह्मण्य किस परंपरा से संबंधित है?+
कुक्के सुब्रह्मण्य मुरुगन मंदिरों में से एक है, जो मुरुगन (कार्तिकेय) को समर्पित है।
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर का समय क्या है?+
प्रतिदिन लगभग प्रातः 6:30 से दोपहर 1:30 तक और अपराह्न 3:30 से रात्रि 9:00 बजे तक; नड़ई 9:00 से 9:30 के बीच बंद होती है। मंदिर के नियमानुसार दर्शन से पूर्व शर्ट और बनियान उतारना आवश्यक है। सर्प संस्कार के भक्त प्रातः 8:30 बजे आदि सुब्रह्मण्य में उपस्थित होते हैं; आश्लेष बलि तीन बार — प्रातः 6:30, 8:30 और सायं 5:00 बजे। उत्सवों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर कार्यालय से पुष्टि कर लें।
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर घूमने का सर्वोत्तम समय क्या है?+
अक्टूबर से मार्च; चंपा षष्ठी (नवंबर–दिसंबर) यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर की स्थापना कब हुई?+
कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर — अति प्राचीन — किसी निश्चित शताब्दी का प्रमाण उपलब्ध नहीं; 'शंकर विजयम्' में 'कुक्केलिंग' के रूप में स्तुत और नवीं शताब्दी के शिलालेख में उल्लिखित; गर्भगृह का जीर्णोद्धार 2005।
स्रोत और अधिक जानकारी
चित्र: BHARATHESHA ALASANDEMAJALU · CC BY-SA 4.0
