हरि और हर के पुत्र, वन से घिरी एक पहाड़ी पर — जहाँ केवल पैदल पहुँचा जा सकता है, और जहाँ इकतालीस दिन का व्रत तथा सिर पर धरा इरुमुडि ही उन अठारह स्वर्ण-सोपानों का अधिकार देते हैं।
- देवता
- अय्यप्पा (श्री धर्मशास्ता) — हरिहरपुत्र
- स्थान
- शबरीमला, पत्तनंतिट्टा, केरल
- श्रेणी
- देवता
- स्थापना
- अत्यंत प्राचीन पर्वत-धाम — देवस्वम् के अनुसार विग्रह की प्रतिष्ठा भगवान परशुराम ने की और मंदिर पन्दलम के राजा राजशेखर के आश्रय में बना; 1950 की अग्नि के पश्चात पुनर्निर्माण हुआ और तभी वर्तमान पंचलोह विग्रह प्रतिष्ठित हुआ; 1985 में अठारह सोपान पंचलोह से मढ़े गए; 1950 में गठित त्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड के अधीन
- स्थल
- पेरियार टाइगर रिज़र्व के भीतर, अठारह पहाड़ियों से घिरी एक वन-शिखर स्थली — पम्पा के सड़क-छोर से लगभग 5 किमी ऊपर
- घूमने का सर्वोत्तम समय
- वृश्चिकम् की प्रथम तिथि से मकरम् तक चलने वाला मंडल–मकरविलक्कु काल (नवंबर–जनवरी) सबसे बड़ा तीर्थ-अवसर है और सबसे भीड़भरा भी; प्रत्येक मलयालम मास के प्रथम दिन तथा मीनम् का पैंकुनि उत्सवम् (मार्च–अप्रैल) अपेक्षाकृत शांत रहते हैं
- अय्यप्पा अर्थात् श्री धर्मशास्ता — हरिहरपुत्र, हरि और हर के पुत्र, मोहिनी से जन्मे
- इकतालीस दिन का मंडल व्रत और इरुमुडि केट्टु: बिना इरुमुडि कोई अठारह सोपान नहीं चढ़ सकता
- पथिनेट्टाम्पडि — पंचलोह से मढ़े अठारह सोपान, जिन्हें इंद्रियों, रागों, गुणों, विद्या और अविद्या के रूप में पढ़ा जाता है
- तत्त्वमसि — 'वह तू ही है' — वही घोषणा जिसे देवस्वम् इस धाम पर अधिष्ठित मानता है
- केवल नियत दिनों में खुला: मंडल–मकरविलक्कु काल, विषु, मीनम् का उत्सवम् तथा प्रत्येक मलयालम मास के प्रथम दिन
- मकरविलक्कु: मकर संक्रांति पर पोन्नम्बलमेडु में प्रज्वलित दीप, और पन्दलम से तीन दिन में आता तिरुवाभरणम्
- हर जाति और पंथ के तीर्थयात्री एक-दूसरे को 'अय्यप्पा' और 'स्वामी' कहते हैं; सन्निधानम् के पास वावर नड
- केवल पैदल पहुँच — वाहन पम्पा तक ही, जो सन्निधानम् से लगभग पाँच किलोमीटर नीचे है
महत्व
यहाँ यात्रा ही उपासना है, और उसका आरंभ पहाड़ी से बहुत दूर होता है। भक्त किसी पुरोहित अथवा ऐसे गुरुस्वामी से माला ग्रहण करता है जिसने अठारह बार यह चढ़ाई की हो, और मंडल व्रत रखता है: इकतालीस दिन का सादा, ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन, वैराग्य का सूचक काला वस्त्र, केश और नख न काटना। प्रस्थान की पूर्व-संध्या पर केट्टुनिर होता है — नारियल का जल निकालकर उसमें घी भरा जाता है, मानो आसक्ति बाहर और आकांक्षा भीतर — और इरुमुडि बाँधा जाता है: आगे अर्पण, पीछे भक्त की अपनी सामग्री। जिसके सिर पर वह न हो, वह अठारह सोपानों पर पैर नहीं रख सकता। अय्यप्पा की उपासना यहाँ नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में होती है, और मंदिर की परंपरा के अनुसार दस से पचास वर्ष की आयु की स्त्रियों को प्रवेश नहीं मिलता।
पथिनेट्टाम्पडि के अनेक पाठ हैं — पंचेंद्रियाँ, अष्ट राग, त्रिगुण, विद्या और अविद्या; अथवा अठारह पुराण और अठारह लोक — वे अठारह, जिनसे ऊपर उठकर भक्त चढ़ता है। इन सब पर एक ही शब्द अधिष्ठित है, तत्त्वमसि — 'वह तू ही है' — देवस्वम् के लिए यही इस धाम की मूल घोषणा है। यहाँ हर जाति और पंथ के तीर्थयात्री एक-दूसरे को केवल 'अय्यप्पा' और 'स्वामी' कहकर पुकारते हैं; सन्निधानम् के निकट ही वावर नड है — अय्यप्पा के सखा वावर का स्थान — और एरुमेलि में उन्हीं के मंदिर से परंपरागत पथ आरंभ होता है।
मंदिर वर्ष भर नहीं खुलता। मंडलकालम् वृश्चिकम् की प्रथम तिथि से आरंभ होकर इकतालीस दिन धनु की ग्यारहवीं तक चलता है; इसके पश्चात मकर संक्रांति पर मकरविलक्कु आता है, जब तिरुवाभरणम् — भगवान के पवित्र आभूषण — पन्दलम के वलियकोइक्कल मंदिर से तीन दिन की यात्रा कर पहुँचते हैं, और पोन्नम्बलमेडु पर मकरविलक्कु दीप प्रज्वलित होता है। शेष वर्ष गर्भगृह प्रत्येक मलयालम मास के प्रथम दिनों में, विषु पर, तथा मीनम् मास के दस-दिवसीय पैंकुनि उत्सवम् में खुलता है।
अंततः भक्त जो अर्पित करता है वह उसके अपने नारियल का घी है — नेय्याभिषेकम् में वह विग्रह पर ढाला जाता है, मानो जीवात्मा परमात्मा में लौट रहा हो — और रीता नारियल आऴि की अग्नि को सौंप दिया जाता है। और प्रत्येक रात, जब श्रीकोविल के दीप बुझते हैं, अय्यप्पा को लोरी की भाँति हरिवरासनम् सुनाया जाता है।
इतिहास
शबरीमला पत्तनंतिट्टा ज़िले के रान्नी-पेरुनाड गाँव में, घने वन के भीतर स्थित है — अठारह पहाड़ियों से घिरा और पेरियार टाइगर रिज़र्व के आँचल में। नाम स्वयं इस पर्वत की स्मृति है: परंपरा कहती है कि राम के युग की तपस्विनी शबरी ने यहीं तप किया था। देवस्वम् के अनुसार इन्हीं पहाड़ियों की तलहटी में भगवान परशुराम ने विग्रह की प्रतिष्ठा की।
जब दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया, तब उसकी बहन महिषी ने ब्रह्मा से यह वर पाया कि हरि और हर के पुत्र के अतिरिक्त कोई उसका अंत न कर सके; तब विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया, और मोहिनी तथा शिव से जन्मा वह शिशु पम्पा के तट पर रख दिया गया। वहीं पन्दलम के निःसंतान राजा राजशेखर को वह मिला, और एक साधु ने उनसे कहा कि शिशु को महल ले जाएँ और उसके कंठ की स्वर्ण-माला के कारण उसका नाम मणिकंठन् रखें।
बाघिन का दूध लाने वन भेजे गए उस बालक ने अऴुता के तट पर महिषी को धराशायी कर उसका अंत किया, और बाघ पर सवार होकर लौटा। विदा लेते समय उसने एक बाण छोड़ा जो शबरी पर जा गिरा; उसने वहीं मंदिर बनवाने को कहा, और यह भी कि वह उन्हीं पर कृपा करेगा जो इकतालीस दिन का व्रत रखकर आएँ। पन्दलम राजवंश आज भी अपना अंश सँजोए है: उसका प्रतिनिधि तिरुवाभरणम् के साथ चलता है, और उसी वंश के लोग बिना इरुमुडि अठारह सोपान चढ़ते हैं। मंदिर का प्रबंध त्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड करता है, और तांत्रिक अधिकार ताऴमण मडम् के पास है।
स्थापत्य
सन्निधानम् भूमि से लगभग चालीस फुट ऊँचे एक चबूतरे पर खड़ा है। गर्भगृह पर स्वर्ण-पत्र मढ़ी छत है और उस पर चार कलश; चारों ओर दो मंडप तथा बलिक्कल्पुर, और सामने स्वर्ण-मंडित ध्वजस्तंभ। पथिनेट्टाम्पडि, जो कभी निरे पत्थर के थे, अब पंचलोह से मढ़े हैं; उनके चरणों में द्वारपाल वलिय कडुत्त स्वामी और करुप्प स्वामी हैं, और नीचे आऴि। लगभग सौ मीटर दूर मालिकप्पुरत्तम्मा, मणिमंडपम् तथा नागराज और नागयक्षी के स्थान हैं।
त्योहार
समय
मंदिर वर्ष भर नहीं, केवल नियत दिनों में खुलता है। मंडल–मकरविलक्कु काल में गर्भगृह लगभग प्रातः 3:00 से दोपहर 1:00 तक और अपराह्न 3:00 से रात्रि 11:00 तक खुला रहता है: द्वार खुलते ही निर्माल्यम् और अभिषेक, 3:30 बजे गणपति होमम्, प्रातःकाल भर नेय्याभिषेकम्, 7:30 से उषःपूजा, 12:30 बजे उच्चपूजा; फिर संध्या 6:30 पर दीपाराधना, पुष्पाभिषेकम्, 9:30 से अत्ताऴ पूजा और श्रीकोविल बंद होते समय हरिवरासनम्। बोर्ड की सामान्य सूची में दिन का आरंभ 5:00 बजे और हरिवरासनम् लगभग 9:50 बजे होता है। यात्रा से पूर्व त्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड से पुष्टि कर लें।
इस धाम तक केवल पैदल ही पहुँचा जा सकता है। वाहन पम्पा से आगे नहीं जाते, जो लगभग पाँच किलोमीटर नीचे है; बोर्ड अंतिम चरण को घने वन में लगभग चार किलोमीटर की कठिन चढ़ाई बताता है — नीलिमला, शबरीपीडम् और शरम्कुत्ति होते हुए। निकटतम रेलहेड चेंगन्नूर है, लगभग 85 किमी; कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 154 किमी और तिरुवनंतपुरम लगभग 170 किमी। परंपरागत एरुमेलि पथ लगभग 61 किमी पैदल का है; पम्पा के निकट चलक्कयम् मार्ग सबसे छोटा है।
समय सांकेतिक हैं — यात्रा से पहले कृपया मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि कर लें।
आसपास के मंदिर
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर कहाँ स्थित है?+
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर शबरीमला, पत्तनंतिट्टा, केरल, भारत में स्थित है।
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर में किस देवता की पूजा होती है?+
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर अय्यप्पा (श्री धर्मशास्ता) — हरिहरपुत्र को समर्पित है।
शबरीमला श्री धर्मशास्ता किस परंपरा से संबंधित है?+
शबरीमला श्री धर्मशास्ता देवता मंदिरों में से एक है, जो देवगण को समर्पित है।
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर का समय क्या है?+
मंदिर वर्ष भर नहीं, केवल नियत दिनों में खुलता है। मंडल–मकरविलक्कु काल में गर्भगृह लगभग प्रातः 3:00 से दोपहर 1:00 तक और अपराह्न 3:00 से रात्रि 11:00 तक खुला रहता है: द्वार खुलते ही निर्माल्यम् और अभिषेक, 3:30 बजे गणपति होमम्, प्रातःकाल भर नेय्याभिषेकम्, 7:30 से उषःपूजा, 12:30 बजे उच्चपूजा; फिर संध्या 6:30 पर दीपाराधना, पुष्पाभिषेकम्, 9:30 से अत्ताऴ पूजा और श्रीकोविल बंद होते समय हरिवरासनम्। बोर्ड की सामान्य सूची में दिन का आरंभ 5:00 बजे और हरिवरासनम् लगभग 9:50 बजे होता है। यात्रा से पूर्व त्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड से पुष्टि कर लें।
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर घूमने का सर्वोत्तम समय क्या है?+
वृश्चिकम् की प्रथम तिथि से मकरम् तक चलने वाला मंडल–मकरविलक्कु काल (नवंबर–जनवरी) सबसे बड़ा तीर्थ-अवसर है और सबसे भीड़भरा भी; प्रत्येक मलयालम मास के प्रथम दिन तथा मीनम् का पैंकुनि उत्सवम् (मार्च–अप्रैल) अपेक्षाकृत शांत रहते हैं
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर की स्थापना कब हुई?+
शबरीमला श्री धर्मशास्ता मंदिर — अत्यंत प्राचीन पर्वत-धाम — देवस्वम् के अनुसार विग्रह की प्रतिष्ठा भगवान परशुराम ने की और मंदिर पन्दलम के राजा राजशेखर के आश्रय में बना; 1950 की अग्नि के पश्चात पुनर्निर्माण हुआ और तभी वर्तमान पंचलोह विग्रह प्रतिष्ठित हुआ; 1985 में अठारह सोपान पंचलोह से मढ़े गए; 1950 में गठित त्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड के अधीन।
स्रोत और अधिक जानकारी
चित्र: Vinayaraj · CC BY-SA 4.0
